Monday, October 3, 2011

मोदी ने उपवास किया है


बापू ने उपवास किया था
पर सचमुच संन्यास लिया था।
मोदी ने उपवास किया है
पांच सितारा वास किया है।
मुंगेरी का हसीन सपना भी तो
मन में पाल लिया है।
मगर दिखावा ऐसा
मानो गांधी ने अवतार लिया है।
ऐसे ही हसीन सपने
पहले भी तो लोगों ने पाले थे।
पर जब सिर के बाल सामने आए
लटक गए मुंह पर ताले थे।
सौ-सौ चूहे खाकर बिल्ली
भगतिन कहलाएगी कैसे?
रंग नहीं ला पाएंगे
तुम लाख टोटके कर लो ऐसे।

-सुरेश सलिल

Monday, September 19, 2011

Saturday, February 13, 2010

सैकड़ा शमशेर -8

'सौंदर्य' शीर्षक से शमशेर की दो कविताएं हैं, एक 'चुका भी नहीं हूं मैं' में, और दूसरी 'इतने पास अपने' में। पहली वाली का रचनावर्ष 1959 है, दूसरी का स्पष्ट नहीं है। दोनों ही कविताओं में तू, तेरी, तुम, तुम्हारे सर्वनाम आते हैं और कविताओं को व्यक्ति-संबोधित बनाते हैं। और तब भावक के मन में 'तू', 'तुम' सर्वनामों वाले व्यक्ति की पहचान को लेकर जिज्ञासा जागती है। इस गुंझलक को सुलझाने का सूत्र मुझे मलयज की डायरी का दूसरा खंड पढ़ते हुए हाथ लगा। 21 जून 64 की तिथि में मलयज शमशेर के कथन, या कहें स्पष्टीकरण को 'अन्य पुरुष' सर्वनाम में ढाल कर, अपनी डायरी में दर्ज करते हैं : ''किसी व्यक्ति का चेहरा यदि उन्हें सुंदर लगता है, तो इसका संबंध उस व्यक्ति से नहीं होता, वरन उस चेहरे से फूट कर जो उनके सृजनात्मक अहं को प्रतिबिंबित करता है, उसके कारण सुंदर होता है। यह सौंदर्य उनका अपना अलग रचा हुआ सौंदर्य है। अब अगर मान लीजिए किसी के इस 'प्रकार' के सौंदर्य पर वे लुब्ध हुए, तो यह पूरी संभावना है कि वह व्यक्ति यह कभी भी नहीं समझ पाएगा कि वह कवि को क्यों सुंदर दिखा, या जो कुछ भी समझेगा वह बिल्कुल दूसरा, गलत होगा।...''

शमशेर की सब नहीं, तो अधिकांश कविताओं को समझने का यह एक मूल्यवान सूत्र है। उनके यहां प्रेम, सौंदर्य के जितने भी रूप या रंग प्रतिभासित होते हैं, वे वस्तुतः प्रतिभास ही हैं। उन्हें अमूर्तन के रूप में लेकर ही शमशेर की कविता को अंशतः समझा जा सकता है। इन अर्थों में, क्या शमशेर ऐंद्रिय अमूर्तन के कवि कहे जायें?...

शमशेर की एक कविता और उसका अंग्रेजी अनुवाद

मुझे- न मिलेंगे- आप

मुझे
न मिलेंगे आप,
आपका/एकाकी क्षण हूं मैं;
आपका
भय और पाप,
आपका एकाकीपन हूं मैं।

आसमान
ढके हुए है
समुद्र का नीला द्रव;
देर से वह
तके हुए है
आपका
और मेरा कर्तव्य।

बरस पड़ेगा वह
सर पर--
उससे बचाव कोई नहीं।

वह अपनी समाधि है ऊपर;
उससे
अपनाव कोई नहीं।


Would you not be with me

Would you not be with me,
I'm your solitary moment;
Your fear
Your sin, and
Your loneliness I am.

Sky is covering
blu property of the sea;
It is staring of late
your's and mine duty.

It will come down
On our heads-
There is no protection of it.

There is our den of trance
up above,
There is no affection of it
like love.

Wednesday, January 20, 2010

सैकड़ा शमशेर -7


12 मई 2007 की एक टीप :

... न आये
किसी को भले,
याद शमशेर की
न आये...

मैं तो करूंगा ही या...द
अपने महबूब को...

ओफ्!...(मिसप्रिंट!)

(करेक्शन--)
मैं त' करूंगा ही याद
अपने शा'इरे महबूब को!


शमशेर की एक कविता और उसका अंग्रेजी तर्जुमा

धूप कोठरी के आइने में खड़ी
हंस रही है

पारदर्शी धूप के पर्दे
मुस्कुराते
मौन आंगन में

मोम-सा पीला
बहुत कोमल नभ

एक मधुमक्खी हिला कर फूल को
बहुत नन्हा फूल
उड़ गई

आज बचपन का
उदास मां का मुख
याद आता है।

Standing in the mirror of the Cell

Golden light of the sun
Standing in the mirror of the Cell
Is laughing

Curtains of transparent sunlight
Are smiling
In the silent courtyard

The sky is very soft
And yellow like wax

A bee shook to a flower
To a very-very little flower
And gone away

Today I remember
sad face of my mother
of my childhood days.

Monday, January 18, 2010

सैकड़ा शमशेर -6


शमशेर


फूल की नाजुक-मिजाजी को
तुम भले कोई नाम न दो
मैं मगर
देना चाहूंगा उसे
एक नाम--
शमशेर!

शिशु की दुग्ध-धवल किलकारी को
तुम भले कोई नाम न दो
मैं मगर
देना चाहूंगा उसे
एक नाम--
शमशेर!

शा'इर की जांफिशानी को
तुम भले कोई नाम न दो
मैं मगर
देना चाहूंगा उसे
एक नाम--
शमशे...र!

-सुरेश सलिल (शमशेर की पचहत्तरवीं सालगिरह के मौके पर लिखी गई और 'खुले में खड़े होकर' कविता संग्रह में प्रकाशित)



शमशेर की एक कविता और उसका अंग्रेजी तर्जुमा

सींग और नाखून
लोहे के बख्तर कंधों पर।

सीने में सूराख हड्डी का।
आंखों में घास-काई की नमी।

एक मुर्दा हाथ
पांव पर टिका
उल्टी कलम थामे।

तीन तसलों में कमर का घाव सड़ चुका है।

जड़ों का भी कड़ा जाल
हो चुका पत्थर।


The horns and the nails
Iron-made armours on the shoulders.

In the chest, a hole made by a bone
In the eyes : moisture of grass and moss.

A dead hand
staying on the foot
and picking a down-ward pen.

The wound of the waist has been
putrefied in three bowles.

Even the tough network of the roots stonified.

Sunday, January 17, 2010

सैकड़ा शमशेर -5

वालेस स्टीवेंस की एक कविता*

अनु.-शमशेर

अन्वेषण-प्रक्रिया से अपनी
जो कर सके संतुष्ट
ऐसी मन की कविता। सदा ही अन्वेषित
नहीं करनी पड़ी है। वस्तु-परिवेश
तो आरंभ से प्रस्तुत ही रहा।
उसकी सरगम लिपि
जो भी उपलब्ध हो पाई
उसे बस गा भर देना पड़ा है।

लेकिन फिर मंच ही बदल गया।
और वह एक नयी ही चीज हो गया,
पूर्वरूप तो उसका मानो
एक इंगित का शकुन मात्र था।
उसे ही अब सप्राण करना है।

स्थानीय बोली का लहजा सीख लेना है।
अपने युग के युवा-दलों का सामना करना,
अपने युग की युवतियों से भेंट करना
और युद्ध के संदर्भ में सोचना है।
और जो संतोष दे सके ऐसा कुछ खोज कर ले आना है।

एक मंच तैयार करना। और उस मंच पर निरंतर
एक असंतुष्ट अभिनेता की तरह प्रस्तुत होना :
मनन करते हुए धीरे-धीरे
कान में वो ही शब्द बोलना--
सबसे कोमल बारीक पकड़ वाले कान को सुनाने के लिए
दुहराना-- ठीक एकदम वो ही शब्द दुहराना
जो वह सुनना चाहता है।

*प्रख्यात अमेरिकी कवि (1879-1955 )की 'मॉडर्न पोएट' (या शायद 'मॉडर्न पोएम'?) कविता के एक अंश का यह अनुवाद है। (सु.स.)


Friday, January 15, 2010

सैकड़ा शमशेर -4

सिलसिलेवार तीन कविताएं

- शमशेर



मोड़

मोड़ हो जिस जा-- कड़ा हो
(और भी जमकर खड़ा हो)
टूटने के क्षण
नग्न हो
सत्य में अपने।

स्पष्ट
एक कोमलता कि है सौंदर्य ही केवल अमर
आवरण कर ले।

ज्ञान गुन। यह फेरता है क्या।
सूत्र है तू स्वयं माला का।
और फिर मुड़
घूम, चारों ओर देख, परख,
और बढ़ जा,
सत्य में अपने
नग्न
स्पष्ट।

(1943)


हम नए इतिहास का पहला वरक् हैं खुला

हम नये इतिहास का पहला वरक् हैं खुला!

नये मूल्यों का प्रकाश
आज
नये प्रातःकाल में, हम, कई देश,
कई संस्कृतियां, कई इतिहास,
एक हो रहे हैं :
एक
नया अंतःकरण
जिसमें
नया प्राण-पुष्प
खिल रहा है!

नया मानव अरुणमुख है।
प्रथम वेला शांति के दिग्विजय की है!

(1947)


काल तुझसे मेरी होड़ है

काल,
तुझसे मेरी होड़ है : अपराजित तू-- तुझमें
अपराजित मैं वास करूं! इसीलिए
तेरे हृदय में समा रहा हूं।
सीधा तीर सा जो रुका हुआ लगता हो--
कि जैसा ध्रुवनक्षत्र भी न लगे,
ऐसा एकनिष्ठ, स्थिर, कालोपरि
भाव, भावोपरि
सुख, आनंदोपरि
सत्य, सत्यासत्योपरि
मैं-- तेरे भी, ओ काल, ऊपर!

सौंदर्य यही तो है, जो तू नहीं है, ओ काल!
जो मैं हूं--
मैं कि जिसमें सब कुछ है...
क्रांतियां, कम्यून,
कम्युनिस्टी समाज के नाना
कलाविज्ञानदर्शन के
जीवंत वैभव से समन्वित
व्यक्ति मैं।

मैं, जो वह हरेक हूं
जो, तुझसे, ओ काल, परे है!

(15-5-62)